चंदौली के आईटीआई कॉलेज रेवसा में खादी बोर्ड के स्वच्छता अभियान के दौरान अधिकारियों और आयोजकों का अनोखा झाड़ू प्रदर्शन चर्चा में रहा; पहले से चकाचक जगह पर हाथ में नया झाड़ू थामकर हुआ महज फोटो-सेशन।
चंदौली। कहते हैं 'सफाई मन से होनी चाहिए, कैमरे के लिए नहीं'... लेकिन सोमवार को रेवसा स्थित गवर्नमेंट आईटीआई कॉलेज परिसर में कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, ग्रांट थॉर्नटन भारत एलएलपी और श्री खादी आश्रम सेवा समिति कमालपुर के संयुक्त तत्वावधान में गांधी जयंती के उपलक्ष्य में खादी स्टॉल, स्वच्छता अभियान और युवा जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन तो हुआ, लेकिन सफाई के नाम पर जो 'ड्रामा' हुआ, उसने अभियान की गंभीरता पर ही बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों और आयोजकों के हाथ में झाड़ू तो नजर आई, लेकिन उनके काम करने का अंदाज किसी 'नवल कथा' से कम नहीं था। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि जहां ये 'कर्मठ' महानुभाव झाड़ू लगा रहे हैं, वह स्थान पहले से ही साफ दिख रहा है! वहां न कोई धूल-धक्कड़ थी, न कोई पत्ता और न ही कचरे का एक तिनका। पांच-पांच लोग हाथ में ब्रांड-न्यू झाड़ू थामकर बस उस चमचमाती फर्श को ऐसे सहला रहे थे मानो सफाई नहीं, बल्कि कैमरे के आगे कोई मॉडल-पोज दे रहे हों।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह नुमाइश किसके लिए? बापू के स्वच्छता के संदेश को आत्मसात करने के बजाय जब जिम्मेदार ही इस तरह 'दिखावे की झाड़ू' चलाएंगे, तो युवाओं को क्या प्रेरणा मिलेगी?
जमीन पर पसरी वास्तविक गंदगी से आंखें मूंदकर, पहले से चकाचक फर्श पर फोटो खिंचवाकर अधिकारी आखिर किसे धोखा दे रहे हैं? शासन को, जनता को या खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन विचारों को, जिनके नाम पर यह पूरा अमला जमा हुआ था?
कागजी अभियानों और फोटो-अप (Photo-op) संस्कृति का यह बेहतरीन नमूना चंदौली में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह है कि क्या भविष्य में जिम्मेदार अधिकारी इस तरह की 'सफाई नौटंकी' से बाज आएंगे या फिर साफ रास्तों पर ही अपनी निष्ठा का 'झाड़ू' फिरवाते रहेंगे।